वस्तु का स्वरूप
धर्म क्या है ?
धम्मो वत्थुसहावो।
स्वामी कार्तिकेय, कार्तिकायानुप्रेक्षा-जी [गाथा 476] में कहते हैं, वस्तु का स्वभाव ही धर्म है।
ये तो बड़ा ही अलग है, क्योंकी हमने तो सुना था दान/दया/संयम/क्षमा/पूजा/पाठ आदि धर्म है।
अभी २ प्रश्न उठते है -
१. क्या धर्म भी अलग-अलग तरह का होता है? अगर हाँ तो ये तो मनमानी जैसी लगती है
२. क्या दान/दया/संयम/क्षमा/पूजा/पाठ धर्म नहीं है?
सबसे पहले प्रश्न 1 का में जवाब ढूंढ़ते है, क्योंकि किसी का खंडन करने से पहले उसे जानना आवशयक है
हाँ, अलग-अलग अपेक्षा से धर्म अलग होते है।
जैसे -
दूध सफ़ेद है या मीठा या गिला है या तरल है या सुगन्धित है या शुद्व है ?
हम कहेंगे वो इनमे से सब कुछ है।
पर ये तो न्याय नहीं है, क्यूंकि हम धर्म को बस एक अपेक्षा से जानना चाहते है, पर हमें हर एक वस्तु के अनेक आयाम बिना किसी परेशानी ने स्वीकार है, स्वीकार ही नहीं बल्कि बिना आयाम के हमे वस्तु पसंद ही नहीं है, क्योंकि बिना आयामों के वस्तु हो ही नहीं सकती और न ही समझ या सकती है, जैसे -
१. दूध लेने जाए और वो केवल सफ़ेद हो तो हम नहीं लेते, क्योंकि सफ़ेद तो फिनायल भी होता है, तो हमे दूध सफ़ेद के साथ साथ सुगन्धित भी चाहिए
२. पर सुगन्धित तो एस्सेंस(Essence) से भी हो सकता है , तो हमको वो मीठा भी चाहिए
३. पर मीठा तो चीनी भी करती है , तो हमको वो शुद्ध भी चाहिए आदि
अभी शुद्ध किसको कहना ये सिखने की आवश्यकता नहीं हम उसे अनुभव से जानते है।
अनुभव में सारे आयाम (dimensions) एक साथ आते है, पर कहने में केवल एक बार में एक को ही बता सकते है।
वस्तु बहुत सरल भी और जटिल भी है, अनुभव की अपेक्षा वस्तु सरल है, पर कहने की अपेक्षा बहुत बड़ी, जटिल और कठिन है।
वस्तु में अनेक अंत है, इसलिए आचार्यों ने वस्तु को अनेकांत कहा है जैसे हमने दूध में देखा।
पहले हम वस्तु को समझने का प्रयास करते है।
कोई भी वस्तु ३ प्रकार की होती है -
१. अर्थात्मक
२. शब्दात्मक
३. ज्ञानात्मक
जैसे
दूध ३ प्रकार के हो सकते है
१. जो सच में दूध है - जिसमे दुग्धत्व गुण है। - अर्थात्मक दूध
२. एक दूध शब्द है जिसको कोई "Milk"(english) कोई "पालू"(telugu) कोई "दूध"(hindi) शब्द आदि से पुकारता है - शब्दात्मक दूध
३. मेरे ज्ञान में जो दूध आया - ज्ञानात्मक दूध
हम शब्दात्मक और ज्ञानात्मक वस्तु में तो परिवर्तन कर सकते है पर अर्थात्मक वस्तु में परिवर्तन कभी भी त्रिकाल में नहीं कर सकते न ही होता है
जैसे -
दूध को अगर मे चाय कह दूँ तो ये शब्द मे परिवर्तन है, यानी शब्दात्मक दूध मे परिवर्तन, मेरे दूध को दूध न कहने से अर्थात्मक दूध को कोई फरक नहीं पड़ेगा।
अभी मैं अगर दूध को अपने ज्ञान मे चाय ही मानूँ, तो भी यह ज्ञानात्मक दूध में परिवर्तन है, मेरे दूध को चाय मान लेने से असली वस्तु (अर्थात्मक दूध) में कोई भी बदलाव नहीं या सकता ।
इससे यह निश्चित होता है की अर्थात्मक वस्तु सर्वदा शुद्ध है ।
अभी जो वस्तु शुद्ध है उसका वह शुद्ध भाव ही धर्म है ।
अब यह शंका उठती है की क्या किसी भी वस्तु का स्वभाव हमारे लिए धर्म है ?
नहीं, ये शंका ठीक नहीं है, क्यूंकी पर वस्तु का स्वभाव उस वस्तु का धर्म है हमारा नहीं, हमारे लिए तो वो ज्ञान है, ज्ञानात्मक है । हमारी वस्तु का स्वभाव हमारा धर्म है वह ही हमे अनंत सुखी करने मे समर्थ है।
अभी धर्म हमको अपनी वस्तु में ढूंढना है, समझना है, अनुभव करना है। ढूँढने का प्रयास करते है -
इस लोक में कितनी वस्तु है - वस्तु तो अनंत है।
अगर वस्तु की परिभाषा करें तो होना चाइए, जिसकी इस लोक में सत्ता है उसे वस्तु कहते हैं ।
वस्तु का दूसरा नाम "द्रव्य" भी है, और आचार्य कहते है
सत् द्रव्यलक्षणम् (तत्त्वार्थसूत्र/5/29)
द्रव्य तो एक ही है , जिसमे द्रव्यत्व गुण हो, जिसकी सत्ता हो वो "द्रव्य" है।
उस एक द्रव्य के 2 भेद प्रमुख होते है -
१. जीव२. अजीव
उनके भी मुख्यतय 6 भेद हो सकते है क्रमशः -
१. जीव २. पुदगल
३. धर्म
४. अधर्म
५. आकाश
६. काल
इनके भी अनंत भेद प्रभेद हो सकते हैं।
अब इन द्रव्यों में से मैं कौनसा द्रव्य हूँ - ये आसान है "जीव"
अब सारी कड़ियाँ जोड़ें तो समझ आ जाता है -
"जीव का स्वभाव ही धर्म है"
अब अगली शंका आती है ये जीव का स्वभाव क्या है ?? हँसना, रोना, खाना, पीना आदि ??
इनको आगे समझेंगे ।।
Comments
Post a Comment